जो तुमसे शुरू होकर
तुम तक ही पहुँचती है
वो आग मेरे जंगल से
हर रोज़ गुजराती है।
हाँफते कमरे में
वीरान बिछावन पे
सिलवट का अकेलापन
और धुंध में जलते हुए
तेरे मेघ में गलते हुए
जो तुमसे शुरू होकर
तुम तक ही पहुँचती है
वो आग मेरे जंगल से
हर रोज़ गुजराती है।
ये कैसी चुप्पी है?
कैसा सन्नाटा है?
कुछ तुमने खरीदे हैं
कुछ हमने बांटा है
फिर भी एक राह है जो
चलती हुई, ठहरती हुई
तुम तक ही पहुँचने को
तुम तक ही पहुँचती है।
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